
हिमाचल समय, शिमला, 26 दिसम्बर ।
शिमला स्थित इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC) में हाल ही में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटना, जिसमें एक रेज़िडेंट डॉक्टर और मरीज/तीमारदारों के बीच टकराव सामने आया, ने प्रदेश की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर किया है।
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वीडियो वायरल होने के बाद सरकार द्वारा डॉक्टर के विरुद्ध त्वरित कार्रवाई की गई, जो कि पेशेवर मर्यादा के दृष्टिकोण से आवश्यक हो सकती है। किंतु यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि घटना में शामिल अन्य पक्षों—जिन पर डॉक्टर को धमकाने और शारीरिक रूप से हमला करने के आरोप हैं—के विरुद्ध अब तक कोई स्पष्ट और समान कार्रवाई सामने
नहीं आई है। यह स्थिति न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। यह घटना केवल एक व्यक्ति की गलती के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए। IGMC जैसे तृतीयक अस्पतालों में अत्यधिक भीड़, स्टाफ की कमी, लंबे कार्य घंटे और सुरक्षा व्यवस्था का अभाव, डॉक्टरों और मरीजों दोनों के लिए तनावपूर्ण वातावरण बनाता है। ऐसी
परिस्थितियों में संवाद की छोटी-सी चूक भी बड़े टकराव का कारण बन सकती है। प्रदेश के डॉक्टर संगठनों और चिकित्सा समुदाय का मानना है कि एकतरफ़ा और दबाव में लिए गए निर्णय स्वास्थ्यकर्मियों का मनोबल गिराते हैं तथा ‘भीड़ के न्याय’ को प्रोत्साहित करते हैं।
इससे भविष्य में डॉक्टरों की कार्यक्षमता और जनसेवा की भावना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हम मांग करते हैं कि: घटना की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराई जाए।
दोनों पक्षों के विरुद्ध समान कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो। अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ की जाए। मरीजों की शिकायतों के लिए पारदर्शी तंत्र विकसित किया जाए।
स्वास्थ्यकर्मियों को हिंसा से कानूनी संरक्षण दिया जाए।
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सरकार से आग्रह है कि वह तात्कालिक लोकप्रिय निर्णयों के बजाय दीर्घकालिक और संस्थागत सुधारों पर ध्यान दे, ताकि अस्पताल सेवा और विश्वास के केंद्र बने रहें, न कि टकराव के।
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