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मुख्यमंत्री ने नेरी में स्थापित किए जा रहे देश के पहले बायोचार संयंत्र की प्रगति की समीक्षा की

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– परियोजना से राज्य को 28,800 कार्बन क्रेडिट मिलने की संभावना

हिमाचल समय न्यूज़,

30 जून / हमीरपुर।

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हमीरपुर जिले के नेरी में देश का पहला स्वदेशी बायोचार संयंत्र स्थापित किया जा रहा है। यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान देने के साथ-साथ स्थानीय समुदाय के लिए रोजगार एवं आजीविका के नए अवसर सृजित करेगी। इसके अलावा, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जन-जागरूकता बढ़ाने में भी यह महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान करेगी।


हमीरपुर जिले के नेरी और जाहू में दो बायोचार संयंत्र स्थापित करने के लिए पिछले वर्ष अगस्त माह में डॉ. वाई.एस. परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, वन विभाग और प्रोक्लाइम सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड, चेन्नई के बीच त्रिपक्षीय समझौता हस्ताक्षरित किया गया था।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने आज यहां राज्य में स्थापित किए जा रहे बायोचार संयंत्रों की प्रगति की समीक्षा करते हुए कहा कि यह परियोजना रोजगार के अवसर बढ़ाने, वन संसाधनों के सतत् प्रबंधन को प्रोत्साहित करने तथा राज्य को कार्बन क्रेडिट अर्जित करने में सहायक सिद्ध होगी। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ राज्य के आर्थिक विकास को भी नई गति मिलेगी। परियोजना के लिए एकत्रित बायोमास की खरीद 2.50 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से की जा रही है तथा गुणवत्ता बनाए रखने पर प्रदर्शन आधारित प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है।


मुख्यमंत्री ने कहा कि इस कार्यक्रम के अंतर्गत चीड़ की पत्तियांे (पाइन नीडल्स), लैंटाना, बांस तथा अन्य वृक्ष एवं पौध-आधारित बायोमास का उपयोग कर बायोचार का उत्पादन किया जाएगा। परियोजना की 10 वर्ष की परिचालन अवधि में लगभग 28,800 कार्बन क्रेडिट उत्पन्न होने का अनुमान है, जिससे हिमाचल प्रदेश की हरित पहलों को उल्लेखनीय बढ़ावा मिलेगा।
श्री सुक्खू कहा कि हिम एवरग्रीन इंटीग्रेटेड क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर एंड एग्रो-फॉरेस्ट्री कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि प्रणालियों में वृक्षों का समावेश किया जाएगा। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रति प्रयास बढ़ेंगे तथा किसानों के लिए दीर्घकालिक आर्थिक अवसर सृजित होंगे। हिमाचल प्रदेश के 50,000 हेक्टेयर पात्र कृषि क्षेत्र में लागू होने वाला यह कार्यक्रम 1.35 करोड़ (13.5 मिलियन) टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के प्रबंधन में योगदान देगा।

इससे मृदा स्वास्थ्य में सुधार, जैव विविधता का संरक्षण, कृषि की जलवायु अनुकूलता में वृद्धि तथा कार्बन अवशोषण के माध्यम से मापनीय जलवायु परिणाम प्राप्त होंगे। कार्यक्रम के अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय कार्बन बाजार मानकों के अनुरूप जीआईएस, रिमोट सेंसिंग तथा डिजिटल डेटा संग्रह प्रणाली का उपयोग किया जाएगा।

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