
हिमाचल समय, सोलन 20 जून।
20 जून को सोलन की अधिष्ठात्री देवी माता शूलिनी शहर के भ्रमण पर निकलेंगे इस दौरान वह अपने भक्तों को दर्शन देने के बाद गंज बाजार स्थित अपनी बहन माता दुर्गा के यहां तीन दिनों तक निवास करेगी।

माता शूलिनी की झांकी दोपहर बाद शिल्ली रोड स्थित मंदिर से प्रस्थान करेगी। इस दौरान माता की झांकी को शहर के चौक बाजार व पुराना बस स्टैंड पर भक्तों के दर्शन के लिए रोका जाएगा।
माता शूलिनी की झांकी के साथ गणेश भगवान, ब्रह्मा विष्णु महेश और माता दुर्गा की झांकियां भी निकली जाएंगी। देर रात तक शहर में अपने भक्तों को
सोलन में माता शुलिनी मेले का भव्य आयोजन: तीन दिन तक चलेगा भंडारों का सिलसिला, भूखा नहीं रहेगा कोई
दर्शन देने के बाद माता शूलिनी वापस गंज बाजार स्थित माता दुर्गा मंदिर में रुकेगी और 22 जून को देर रात अपने निवास स्थान के लिए प्रस्थान करेंगी।

शूलिनी माता का इतिहास बघाट रियासत से जुड़ा है। माता शूलिनी बघाट रियासत के शासकों की कुलदेवी देवी मानी जाती है। माता शूलिनी का मंदिर सोलन शहर के शीली मार्ग पर स्थित है।
शहर की अधिष्ठात्री देवी शूलिनी माता के नाम से ही शहर का नाम सोलन पड़ा, जो देश की स्वतंत्रता से पूर्व बघाट रियासत की राजधानी के रूप में जाना जाता था।
यहां का नाम बघाट भी इसलिए पड़ा क्योंकि रियासत में 12 स्थानों का नामकरण घाट के साथ था। माना जाता है कि बघाट रियासत के
शासकों ने यहां आने के साथ ही अपनी कुलदेवी शूलिनी माता की स्थापना सोलन गांव में की और इसे रियासत की राजधानी बनाया।

मान्यता के अनुसार बघाट के शासक अपनी कुल देवी की प्रसन्नता के लिए प्रतिवर्ष मेले का आयोजन करते थे। लोगों का मानना है कि
मां शूलिनी के प्रसन्न होने पर क्षेत्र में किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा व महामारी का प्रकोप नहीं होता, बल्कि खुशहाली आती है और मेले की यह परंपरा आज भी कायम है।
मां शूलिनी की अपार कृपा के कारण ही शहर दिन-प्रतिदिन सुख व समृद्धि की ओर से अग्रसर है। पहले यह मेला केवल एक दिन ही मनाया जाता था,
लेकिन सोलन जिला के अस्तित्व में आने के पश्चात इसका सांस्कृतिक महत्व बनाए रखने, आकर्षक बनाने व पर्यटन दृष्टि से बढ़ावा देने के लिए इसे राज्यस्तरीय मेले का दर्जा दिया गया।
अब यह मेला जून माह के तीसरे सप्ताह में तीन दिनों तक मनाया जाता है। पहले छोटे स्तर पर आयोजित होने वाले शूलिनी मेले का आज स्वरूप विशाल हो गया है,
आज यह राज्यस्तरीय तीन दिवसीय मेले के रूप में मनाया जाता है। जिला प्रशासन इस मेले को करवाता और अब मेले का बजट एक करोड़ पहुंच गया है।

बड़ी बहन के घर पर दो दिनों तक रुकती हैं माता
सोलन की अधिष्ठात्री देवी मां शूलिनी मेले के पहले दिन पालकी में बैठकर अपनी बड़ी बहन मां दुर्गा से मिलने पहुंचती है। दो बहनों के इस मिलन के साथ ही राज्य स्तरीय मां शूलिनी मेले का आगाज हो जाता है।
मां शूलिनी अपने मंदिर से पालकी में बैठकर शहर की परिक्रमा करने के बाद गंज बाजार स्थित अपनी बड़ी बहन मां दुर्गा से मिलने पहुंचती है। मां शूलिनी तीन दिनों तक लोगों के दर्शानार्थ वहीं विराजमान रहती है।
शूलिनी मेले में स्थानीय व्यापारी वर्ग व लोग भी खुलकर दान करते है। जिला के कोने कोने में दर्जनों भंडारे सड़कों पर लगे होते हैं। कहीं पर अलग अलग तरह के व्यंजन तो कहीं पर जूस, आइसक्रीम, खीर, पूड़े,
चने भटूरे आदि अनेकों तरह के पकवान मेले में आने वाले हजारों की संख्या में आने वाले लोगों को खाने को मिलते हैं। लोग यदि जेब में सिर्फ किराया लेकर भी
आए तो भी मजे में मेला घूमकर पेट भरकर वापिस जा सकते हैं। प्रदेश में इस तरह का यह पहला मेला है, जहां पर तीन दिनों तक सारा दिन दर्जनों भंडारे लगते हैं।

खेलकूद व सांस्कृतिक संध्याएं होती है आकर्षण का केंद्र
तीन दिवसीय मेले में तीनों दिन विभिन्न तरह की खेलकूद प्रतियोगिताएं, कुश्ति व सांस्कृतिक संध्याएं लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र रहती है।
शूलिनी मेले में प्रदेश के छोटे बडे़ कलाकारों समेत पंजाबी व बालीवुड गायक सांस्कृतिक संध्याओं में रंग जमाते हैं।
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