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सतत कृषि उद्यमिता की रीढ़ हैं अनुसंधान एवं नवाचार : कुलपति

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Satat Krishi Udyamita
नौणी में आईसीएआर प्रायोजित विंटर स्कूल का शुभारंभ हुआ। कुलपति प्रो. आर.एस. चंदेल ने कहा कि अनुसंधान एवं नवाचार सतत बागवानी उद्यमिता की रीढ़ हैं।

हिमाचल समय, सोलन, 28 जनवरी ।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रायोजित ‘अनुकूलित मूल्य श्रृंखला के माध्यम से बागवानी फसलों में कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देना,’  विषय पर आयोजित 21 दिवसीय विंटर स्कूल का आज डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में शुभारंभ हुआ। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन विश्वविद्यालय के खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा किया

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जा रहा है। प्रतिभागियों एवं विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति और मुख्य अतिथि प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि बागवानी क्षेत्र में सतत कृषि उद्यमिता की आधारशिला अनुसंधान एवं नवाचार हैं।

उन्होंने कहा कि उच्च उत्पादन क्षमता होने के बावजूद बागवानी फसलें अत्यधिक नाशवान होती हैं तथा अपर्याप्त हैंडलिंग, भंडारण एवं प्रसंस्करण अवसंरचना के कारण इनमें कटाई उपरांत भारी क्षति होती है।

प्रो. चंदेल ने कहा कि बागवानी कृषि का एक अत्यंत गतिशील एवं संभावनाशील क्षेत्र बनकर उभरी है, जो आय वृद्धि, रोजगार सृजन तथा पोषण सुरक्षा के व्यापक अवसर प्रदान करती है। किंतु इस क्षमता को साकार करने के लिए उत्पादन-केन्द्रित खेती से

आगे बढ़कर उद्यम-आधारित एवं बाजार से जुड़ी कृषि उद्यमिता की ओर दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। उन्होंने बताया कि बागवानी फसलों में कटाई उपरांत क्षति लगभग 30 प्रतिशत तक आंकी गई है, जो आर्थिक नुकसान एवं संसाधनों की बर्बादी का प्रमुख कारण है।

मूल्य श्रृंखला के प्रत्येक चरण में वैज्ञानिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने वैज्ञानिकों से अपनी विशिष्ट पहचान (यूएसपी) को पहचानने तथा युवा शोधकर्ताओं को विस्तार योग्य, विपणन योग्य एवं पेटेंट योग्य तकनीकों के विकास हेतु मार्गदर्शन देने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने पश्चिमी मान्यताओं पर अत्यधिक निर्भरता से आगे बढ़ने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

इस अवसर पर विशेष अतिथि एवं मुख्य वक्ता निफ्टेम सोनीपत के अधिष्ठाता (स्नातकोत्तर अध्ययन) डॉ. सुनील पारेख ने कहा कि समग्र पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार हुआ है, फिर भी कई पहलुओं पर अभी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के विकास पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि नवीनतम तकनीकों को अपनाए बिना व्यवसाय टिकाऊ नहीं रह सकते, परंतु प्रत्येक पश्चिमी तकनीक भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हो, यह जरूरी नहीं है। उन्होंने वैज्ञानिकों से स्थानीय समस्याओं की पहचान कर उनके स्थानीय समाधान विकसित करने के लिए सामूहिक प्रयास करने का आह्वान किया।

निदेशक (अनुसंधान) डॉ. देविना वैद्य ने कहा कि बागवानी मूल्य श्रृंखला में दक्षता, गुणवत्ता एवं लाभप्रदता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने बताया कि कटाई उपरांत प्रौद्योगिकी, खाद्य प्रसंस्करण, जैव प्रौद्योगिकी एवं जैव अभियांत्रिकी में हुई प्रगति ने बागवानी उत्पादों एवं अवशेषों को उच्च मूल्य उत्पादों में परिवर्तित करने के नए अवसर खोले हैं।

उन्होंने वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों, किसानों एवं उद्यमियों को कटाई उपरांत प्रबंधन, प्रसंस्करण तकनीक, पैकेजिंग, गुणवत्ता आश्वासन एवं विपणन में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान करने में विश्वविद्यालयों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।

बागवानी महाविद्यालय के अधिष्ठाता डॉ. मनीष शर्मा ने कहा कि बागवानी को एक प्रतिस्पर्धी एवं सतत कृषि व्यवसाय क्षेत्र में परिवर्तित करने के लिए कुशल मानव संसाधन एवं सशक्त उद्यमशील नेतृत्व की उपलब्धता अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि कृषि का फोकस अब प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, बाजार एकीकरण एवं क्षमता निर्माण की ओर स्थानांतरित हो गया है, जिससे व्यावहारिक एवं हाथों-हाथ प्रशिक्षण का महत्व और बढ़ गया है।

प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. राकेश शर्मा ने जानकारी दी कि इस विंटर स्कूल में ओडिशा, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के 10 विश्वविद्यालयों एवं 2 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) से कुल 19 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं।

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उन्होंने बताया कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य वैज्ञानिक समुदाय को प्रसंस्करण, अनुकूलित मूल्य श्रृंखला, अपशिष्ट के पुनर्चक्रण एवं आर्थिक सुदृढ़ता के माध्यम से कृषि उद्यमिता के प्रति संवेदनशील बनाना है, जो सततता, जलवायु सहनशीलता एवं आत्मनिर्भर कृषि जैसे राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप है।

कार्यक्रम के अंतर्गत अनुसंधान संस्थानों, स्टार्ट-अप्स, किसान उत्पादक कंपनियों (एफपीसी), स्वयं सहायता समूहों एवं नीति समर्थन प्रणालियों के बीच सशक्त सहयोग पर विशेष बल दिया गया है, ताकि प्रयोगशाला में विकसित नवाचारों को जमीनी स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जा सके।

प्रशिक्षण के दौरान विशेषज्ञ सत्रों एवं मॉडल फार्म, प्राकृतिक खेती मॉडल, हिमएग्री सॉल्यूशंस यूनिट, दिलमन डेलिकेसीज़, मिंचीज़, मशरूम निदेशालय, केवीके कंडाघाट तथा मशोबरा अनुसंधान केंद्र  के लिए शैक्षणिक भ्रमण भी आयोजित किया जाएगा।

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