
हिमाचल समय, सोलन, 28 जनवरी ।
हिमाचल प्रदेश में जलवायु परिवर्तन एवं रासायनिक, जैविक, विकिरणीय एवं परमाणु (सीबीआरएन) जोखिमों के न्यूनीकरण हेतु बहु-क्षेत्रीय कार्रवाई को प्रभावी रूप से लागू करने पर केंद्रित दो दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ आज डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में हुआ।
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इस कार्यशाला का आयोजन विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (डीडीएमए), सोलन के सहयोग से किया जा रहा है। इस कार्यशाला का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न आपदाओं एवं उभरते सीबीआरएन जोखिमों से निपटने के लिए संस्थागत तैयारी को सुदृढ़ करना तथा विभिन्न विभागों के बीच समन्वय को मजबूत बनाना है।
कार्यक्रम में नीति-निर्माताओं, प्रशासकों, विषय विशेषज्ञों, स्वास्थ्य क्षेत्र के पेशेवरों, शिक्षाविदों एवं विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी आपदाओं एवं सीबीआरएन जोखिमों पर गहन मंथन किया।
उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, सोलन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं अतिरिक्त उपायुक्त राहुल जैन ने कहा कि इस कार्यशाला का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन एवं सीबीआरएन जोखिमों से निपटने की वर्तमान प्रणाली में मौजूद खामियों की पहचान करना तथा विशेषज्ञों के माध्यम से इनके व्यावहारिक समाधान तलाशना है।
उन्होंने कहा कि सोलन जिला बीते वर्षों में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हुआ है तथा यहां एक बड़ा औद्योगिक क्षेत्र भी है, जिससे यह जिला विभिन्न प्रकार के जोखिमों के प्रति संवेदनशील बनता है।
उन्होंने आशा व्यक्त की कि कार्यशाला के दौरान किए गए विमर्श के आधार पर एक श्वेत पत्र तैयार किया जाएगा, जो प्रभावी एवं संरचित प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करने में सहायक होगा। उन्होंने कहा कि आपदा प्रबंधन की तैयारी में पिछले वर्षों में सुधार हुआ है, फिर भी बदलती चुनौतियों से निपटने के लिए और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है।
समाज में व्यवहारिक बदलाव की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने सामाजिक जागरूकता बढ़ाने का आह्वान किया तथा विशेषज्ञों से व्यावहारिक और लागू किए जा सकने वाले सुझाव देने का आग्रह किया।
अनुसंधान निदेशक डॉ. देविना वैद्य ने नाजुक पारिस्थितिक तंत्रों की वहन क्षमता (कैरीइंग कैपेसिटी) के अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया तथा विकास एवं आपदा जोखिम प्रबंधन के बीच संतुलित और सतत दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि सोलन जैसे जिले अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन, वनों में आग तथा जनस्वास्थ्य आपात स्थितियों जैसी जलवायु-संबंधी आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं। इस परिप्रेक्ष्य में कार्यशाला का उद्देश्य वैज्ञानिक ज्ञान, नीति ढांचे एवं आपदा जोखिम न्यूनीकरण रणनीतियों को जिला एवं स्थानीय स्तर पर क्रियान्वित योजनाओं में बदलना है।
इससे पूर्व पर्यावरण विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. एस.के. भारद्वाज ने कहा कि यह कार्यशाला ऐसे महत्वपूर्ण समय में आयोजित की जा रही है, जब प्रदेश ने हाल के वर्षों में कई आपदाओं का सामना किया है, जिससे जान-माल की भारी क्षति हुई है। उन्होंने कहा कि विभिन्न क्षेत्रों से आए विशेषज्ञों के बीच विचार-विमर्श से भविष्य की आपदाओं से निपटने हेतु शमन एवं तैयारी उपायों को और सुदृढ़ किया जाएगा।
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कार्यशाला में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग, राज्य स्वास्थ्य विभाग, टाटा ट्रस्ट्स, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क), मुंबई, आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड रिसर्च, नई दिल्ली, कृषि विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, केंद्रीय हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, तथा डॉ. वाई.एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी सहित विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।
कार्यशाला के दौरान तकनीकी सत्र, विशेषज्ञ व्याख्यान, पैनल चर्चाएं तथा हितधारकों के साथ संवाद सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, आपदा जोखिम शासन, सीबीआरएन तैयारी तथा समुदाय-आधारित जोखिम न्यूनीकरण जैसे विषयों पर चर्चा होगी। कार्यशाला से जागरूकता बढ़ने, संस्थागत क्षमताओं को सुदृढ़ करने तथा जिला आपदा प्रबंधन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु व्यावहारिक सिफारिशें सामने आने की अपेक्षा है।
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