Home हिमाचल प्रदेश प्रकृति-आधारित कृषि एवं लघु वनोपज पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

प्रकृति-आधारित कृषि एवं लघु वनोपज पर राष्ट्रीय संगोष्ठी

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Prakriti Aadharit Krishi
Dr. Y. S. Parmar University of Horticulture and Forestry ने “Sustainable Synergies 2026” के तहत प्रकृति-आधारित कृषि एवं एनटीएफपी विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया, जिसमें Indian Institute of Technology Delhi सहभागी रहा।

हिमाचल समय, सोलन, 25 फरवरी ।

डॉ. वाई. एस. परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय द्वारा “सस्टेनेबल सिनर्जीज़ 2026” शीर्षक से प्रकृति-आधारित कृषि एवं नॉन टिम्बर फॉरेस्ट प्रोडक्टस (एन.टी.एफ.पी) विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के सहयोग से ANRF-PAIR (त्वरित नवाचार एवं अनुसंधान साझेदारी कार्यक्रम) के अंतर्गत आयोजित की गई।

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इस अवसर पर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली और आईआईटी रुड़की, पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, शूलिनी विश्वविद्यालय, रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय और नौणी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया। संगोष्ठी में प्रकृति-आधारित कृषि प्रणालियों एवं नॉन टिम्बर फॉरेस्ट प्रोडक्टस को मुख्यधारा की पर्यावरणीय स्थिरता रूपरेखा में समाहित करने हेतु नवाचारपूर्ण एवं सतत उपायों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि निदेशक अनुसंधान डॉ. देविना वैद्य ने अपने संबोधन में कहा कि शैक्षणिक संस्थानों की जिम्मेदारी केवल अनुसंधान सृजन तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक ज्ञान को समाज के हित में फील्ड स्तर तक पहुंचाना भी आवश्यक है। उन्होंने ए.एन.आर.एफ. परियोजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम सहयोगात्मक एवं अंतःविषयक अनुसंधान को सुदृढ़ करते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के ग्रामीण विकास एवं प्रौद्योगिकी केंद्र की प्रो. अनुश्री मलिक ने कहा कि विश्वविद्यालय ने हिमालयी परिप्रेक्ष्य में ज्ञान प्रणाली को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभाई है। निदेशक विस्तार शिक्षा डॉ. इंदर देव ने राज्य में प्राकृतिक खेती की सफलता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्रदेश में 2.2 लाख से अधिक किसान प्राकृतिक खेती अपना चुके हैं। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. यशपाल शर्मा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के उद्देश्यों की जानकारी दी।

संगोष्ठी में जैव प्रौद्योगिकी, मृदा विज्ञान, सूक्ष्मजीव विज्ञान, पर्यावरण अभियांत्रिकी एवं सतत कृषि के क्षेत्र में कार्यरत विशेषज्ञों द्वारा पाँच मुख्य व्याख्यान प्रस्तुत किए गए।

प्रो. अनुश्री मलिक ने ‘ऐलगे-सहायित प्रकृति-आधारित कृषि: वर्तमान अनुसंधान एवं उत्पाद विकास परिदृश्य” विषय पर व्याख्यान देते हुए ऐलगे-आधारित जैव उर्वरकों, जैव प्रेरकों एवं जैव कीटनाशकों की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह तकनीक बीज अंकुरण, फसल उत्पादकता एवं मृदा स्वास्थ्य को बढ़ाने में सहायक है तथा रासायनिक आदानों पर निर्भरता कम करती है। उच्च उत्पादन लागत, सीमित भंडारण अवधि एवं जागरूकता की कमी जैसी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपशिष्ट जल उपचार, कार्बन अवशोषण एवं फसल पोषक उत्पादों के एकीकृत उत्पादन हेतु ‘ऐलगे बायोरिफाइनरी मॉडल’ का सुझाव दिया। प्रो. सुधीर वर्मा ने प्राकृतिक खेती के माध्यम से पुनर्योजी मृदा प्रबंधन विषय पर व्याख्यान देते हुए कम लागत वाली सतत कृषि पद्धतियों, मृदा उर्वरता की पुनर्स्थापना, अंतःफसल प्रणाली, जल संरक्षण, देशी केंचुओं की सक्रियता एवं सांस्कृतिक कीट प्रबंधन पर बल दिया।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के डॉ. निलेंदु बसाक ने पर्यावरण संरक्षण में मृदा सूक्ष्मजीव: मृदा स्वास्थ्य, जलवायु सहनशीलता एवं उभरते प्रदूषकों का संबंध विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने मृदा सूक्ष्मजीव समुदायों की भूमिका पोषक तत्व चक्र, ग्रीनहाउस गैस नियंत्रण एवं प्रदूषक रूपांतरण में महत्वपूर्ण बताई। भारी धातुओं, सूक्ष्म प्लास्टिक एवं एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीन जैसे उभरते प्रदूषकों पर भी चर्चा की गई। उन्होंने देशी एवं आनुवंशिक रूप से संशोधित सूक्ष्मजीवों के माध्यम से मृदा उर्वरता एवं फसल उत्पादकता बढ़ाने पर चल रहे अनुसंधान की जानकारी दी।

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के डॉ. रवि कांत भाटिया ने हरित एवं सतत जैव-अर्थव्यवस्था के लिए अभियांत्रिक बायोचार आधारित मूल्य संवर्धित उत्पाद” विषय पर व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि संशोधित संरचना वाला बायोचार मृदा उर्वरता बढ़ाने, कार्बन अवशोषण, प्रदूषकों के नियंत्रण तथा उच्च मूल्य के जैव-आधारित उत्पादों के विकास में सहायक है।

डॉ. संजीव चौहान, पूर्व निदेशक अनुसंधान ने पर्यावरणीय स्थिरता विषय पर व्याख्यान देते हुए प्राकृतिक खेती को नॉन टिम्बर फॉरेस्ट प्रोडक्टस से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जलवायु परिवर्तन अनुकूलन एवं शमन रणनीतियों, स्थिरता के चार स्तंभों तथा प्रत्यक्ष वन लाभों से अप्रत्यक्ष लाभों की ओर अनुसंधान के फोकस को स्थानांतरित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र में सतत विकास हेतु बहु-विषयक सहयोग एवं दीर्घकालिक पारिस्थितिकीय योजना की आवश्यकता रेखांकित की।

संगोष्ठी की चर्चाओं में ANRF PAIR ढांचे के अंतर्गत संस्थागत साझेदारी की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित किया गया। समापन सत्र में अनुसंधान नेटवर्क को सुदृढ़ करने, प्रकृति-आधारित कृषि मॉडल को बढ़ावा देने तथा समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने पर सहमति व्यक्त की गई। इस आयोजन के सह-समन्वयक डॉ. पंकज ठाकुर एवं डॉ. रोहित शर्मा रहे।

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ANRF PAIR पहल शैक्षणिक उत्कृष्टता, अंतःविषयक सहयोग एवं राष्ट्रीय क्षमता निर्माण की साझा परिकल्पना का प्रतिनिधित्व करती है। ऊर्जा, पर्यावरणीय स्थिरता एवं फोटोनिक्स इसके प्रमुख विषयगत क्षेत्र हैं, जो राष्ट्रीय एवं वैश्विक चुनौतियों के समाधान हेतु एक सशक्त मंच प्रदान करते हैं। इस ढांचे के अंतर्गत भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली हब संस्थान है, जबकि दिल्ली प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, नेताजी सुभाष प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, जम्मू विश्वविद्यालय तथा इंदिरा गांधी दिल्ली महिला तकनीकी विश्वविद्यालय स्पोक संस्थान हैं, जो सामूहिक रूप से इस साझेदारी की वैज्ञानिक आधारशिला को सुदृढ़ करते हैं।

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