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विजिलेंस और एसीबी को आरटीआई से बाहर करना कानून के दायरे में कैसे : जयराम ठाकुर

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भूपेंद्र ठाकुर/शिमला।

मुख्यमंत्री द्वारा राज्य सतर्कता विभाग (विजीलैंस) को आरटीआई के कानूनी दायरे से बाहर करने के फैसले का विपक्ष ने कड़ा एतराज जताया है। विपक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री सुक्खू ग़लत तर्क दे रहे हैं कि विजीलैंस को आरटीआई से बाहर पूरी तरह से कानून के दायरे में रहकर किया गया एक प्रशासनिक निर्णय है। मुख्यमंत्री सुक्खू के इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने कहा कि विजिलेंस और एंटी करप्शन ब्यूरो का गठन ही भ्रष्टाचार को जड़ से मिटाने और गलत कार्य करने वाले रसूखदार लोगों पर नकेल कसकर उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डालने के लिए किया गया था। लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे आरटीआई से बाहर कर विभाग की मूल आत्मा को ही गौण कर दिया है और मनमाने तरीके से आदेश जारी कर पारदर्शिता के उस स्तंभ को गिराने का प्रयास किया है जिसे भ्रष्टाचार रोकने के लिए सबसे प्रभावी हथियार माना जाता था। सबसे बड़ी बात यह कानून कांग्रेस की सरकार द्वारा ही लाया गया था। जिसे सुक्खू सरकार निष्प्रभावी बनाने में जुटी है।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि आरटीआई कानून 2005 की धारा 24 में साफ़ लिखा है कि सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियों को भी भ्रष्टाचार और मानवाधिकार हनन के मामले में सूचना देनी ही होगी। इस अधिकार को संसद और राज्यों की विधान सभाएं भी देश वासियों से नहीं छीन सकती हैं। ऐसे में एक चिट्ठी निकालकर मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने वाली संस्था विजिलेंस और एसीबी को सूचना देने से कैसे रोक सकते हैं। गैरकानूनी तरीके से लाया गया उनका यह फैसला कानूनी तौर पर कैसे सही हो सकता है। इस फैसले के पीछे की मंशा को भी सरकार को स्पष्ट करना चाहिए। सुक्खू सरकार का यह फैसला लोकतांत्रिक ढांचे के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

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