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फलों, फूलों एवं औषधीय एवं सुगंधित पौधों के पैकेज ऑफ प्रैक्टिस पर राज्य स्तरीय कार्यशाला नौणी में आयोजित

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#AgriculturalResearch
खेती की लागत घटाकर मुनाफा बढ़ाने की जरूरत: प्रो चंदेल

हिमाचल समय, सोलन, 08 अगस्त।

फलों, फूलों एवं औषधीय एवं सुगंधित पौधों के पैकेज ऑफ प्रैक्टिस (PoP) पर राज्य स्तरीय कार्यशाला का आठवां संस्करण डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी में शुरू हुआ। यह दो दिवसीय कार्यशाला, हिमाचल प्रदेश उद्यान विभाग के सहयोग से आयोजित की जा रही है।

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विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) और अनुसंधान स्टेशनों के वैज्ञानिकों के साथ-साथ उद्यान विभाग के अधिकारी इस कार्यशाला में भाग ले रहे हैं, जिसमें पैकेज ऑफ प्रैक्टिस  में शामिल करने के लिए नई सिफारिशों पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। 

पैकेज ऑफ प्रैक्टिस   किसी विशेष क्षेत्र और फसल के लिए वैज्ञानिक रूप से अनुशंसित दिशा-निर्देशों का एक संपूर्ण सेट होता है, जिसमें फसल चक्र के सभी पहलू—जैसे कि किस्म का चयन, भूमि तैयारी, बुवाई, पोषण प्रबंधन, सिंचाई, खरपतवार, 

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कीट एवं रोग प्रबंधन से लेकर कटाई एवं कटाई के बाद की प्रक्रियाएँ शामिल होती हैं। यह एक संपूर्ण मार्गदर्शिका के रूप में कार्य करता है, जिसका उद्देश्य उत्पादन, गुणवत्ता एवं लाभप्रदता को अधिकतम करना और साथ ही टिकाऊ एवं संसाधन-कुशल कृषि को बढ़ावा देना है।

इस अवसर पर कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने उद्यान विभाग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि फील्ड स्तर की चुनौतियों के समाधान के लिए आपसी सहयोग को और मजबूत किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए खेती की लागत कम की जानी

चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि पैकेज ऑफ प्रैक्टिस   में बड़े वाणिज्यिक तकनीकों के साथ-साथ छोटे कृषक परिवारों के लिए उपयुक्त कम लागत वाली तकनीकों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

राज्य की प्राकृतिक खेती में हुई प्रगति की सराहना करते हुए प्रो. चंदेल ने कहा कि हिमाचल प्रदेश ने विश्व स्तरीय, भरोसेमंद कृषि-पर्यावरणीय मॉडल विकसित किया है। भारी वर्षा के बावजूद प्राकृतिक खेती करने वाले किसान अच्छे परिणाम प्राप्त कर रहे हैं।

उद्यान निदेशक विनय सिंह ने कहा कि उद्यानिकी प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना करने के लिए पैकेज ऑफ प्रैक्टिस   को नियमित रूप से अद्यतन करना आवश्यक है, जिसमें जलवायु-सहिष्णु, जल-कुशल, सूखा-रोधी और रोग-प्रतिरोधी किस्मों को शामिल किया जाए।

उन्होंने स्थानीय एवं वैश्विक ज्ञान के एकीकरण और शीघ्र पकने वाली किस्मों को बढ़ावा देने पर जोर दिया, ताकि प्रदेश की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जा सके। रासायनिक कीटनाशकों के न्यूनतम उपयोग और पैकेज ऑफ प्रैक्टिस   

में प्राकृतिक खेती के समावेश के लिए किसानों को जागरूक करने की आवश्यकता पर भी उन्होंने बल दिया। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि किसान-केंद्रित PoP किसानों को अत्यधिक लाभान्वित करेगा और ज़ीरो हंगर  तथा सतत विकास लक्ष्यों  की प्राप्ति में सहायक होगा।

इससे पूर्व, डॉ. इंदर देव, निदेशक विस्तार शिक्षा, ने प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए बताया कि विश्वविद्यालय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई तकनीकों और कार्यशाला में हुई

चर्चाओं को संकलित कर किसान-हितैषी साहित्य के रूप में प्रकाशित किया जाएगा, जिससे किसानों को फसल प्रबंधन में मदद मिलेगी। निदेशक अनुसंधान डॉ. संजीव चौहान ने राज्य की फल उत्पादन में हुई उपलब्धियों की जानकारी दी।

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पहली पैकेज ऑफ प्रैक्टिस   कार्यशाला वर्ष 1991 में आयोजित हुई थी और यह इसका आठवां संस्करण है। दो दिनों में आयोजित इस कार्यशाला में छह तकनीकी सत्र होंगे, जिनमें फलों एवं सब्जियों में कीटनाशी अवशेष की निगरानी, 

खाद्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पादप संरक्षण, सुभाष पालेकर प्राकृतिक खेती, पुष्पोत्पादन तथा औषधीय एवं सुगंधित पौधों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। स्वीकृत सिफारिशों को आगामी पैकेज ऑफ प्रैक्टिस   में सम्मिलित किया जाएगा।

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