
हिमाचल समय, शिमला 17 जून।
हिमाचल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों, विशेष रूप से इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज (IGMC), शिमला में स्टाफ नर्सों की भारी कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं।
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स्थिति यह है कि जहां एक वार्ड में 3 से 4 नर्सें होनी चाहिए, वहां सिर्फ 1 या 2 नर्सें ही ड्यूटी पर हैं। इसके चलते नर्सों को न केवल अत्यधिक काम का बोझ झेलना पड़ रहा है, बल्कि उन्हें नियमित छुट्टियाँ भी नहीं मिल पा रहीं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, सामान्य वार्डों में नर्स और मरीज का अनुपात 1:2 से लेकर 1:5 तक होना चाहिए। लेकिन हिमाचल के अस्पतालों में यह अनुपात 1:15 से 1:18 तक पहुँच चुका है।
सीसीयू और आईसीयू में भी स्थिति चिंताजनक है – जहाँ प्रति 1-2 मरीजों पर एक नर्स होनी चाहिए, वहां 3-4 मरीजों की जिम्मेदारी एक ही नर्स के कंधों पर है।
प्रदेश के कई अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या तो बढ़ा दी गई है, लेकिन उस अनुपात में स्टाफ नर्सों के पद नहीं सृजित किए गए हैं।
इस असंतुलन के चलते मरीजों को समय पर सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं और नर्सिंग स्टाफ भी अत्यधिक मानसिक और शारीरिक दबाव में काम कर रहा है।
सरकार ने इस गंभीर स्थिति को देखते हुए IGMC शिमला में 300 नर्सों की भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो आउटसोर्स के माध्यम से की जा रही है। स्वास्थ्य विभाग ने मंत्रिमंडल की स्वीकृति के बाद तीन निजी एजेंसियों को टेंडर भी जारी कर दिए हैं।
प्रदेश की स्वास्थ्य सचिव एम. सुधा ने जानकारी दी कि, “IGMC में नर्सों की भर्ती प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। इसके साथ ही टांडा, हमीरपुर और नेरचौक मेडिकल कॉलेजों में भी रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया चल रही है।
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नई स्टाफ तैनाती से न केवल मरीजों की सेवा में सुधार होगा, बल्कि मौजूदा स्टाफ का दबाव भी कम होगा।” इस बीच, मेडिकल एसोसिएशन ने भी सरकार
को स्टाफ की कमी को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी है और मांग की है कि आउटसोर्सिंग के साथ-साथ स्थायी पदों का भी सृजन किया जाए ताकि स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बनी रहे।
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