Home हिमाचल प्रदेश 11500 फीट पर छितकुल में आधुनिक फल तकनीकों व प्राकृतिक खेती पर शिविर

11500 फीट पर छितकुल में आधुनिक फल तकनीकों व प्राकृतिक खेती पर शिविर

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यह आयोजन भारत-तिब्बत स्थानीय सीमा क्षेत्र के डिप्टी कमांडेंट के सहयोग से आयोजित किया गया।

हिमाचल समय, शिमला 11 जून।

विकसित कृषि संकल्प अभियान–2025 के अंतर्गत डॉ. यशवंत सिंह परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी, सोलन के कृषि विज्ञान केंद्र, किन्नौर

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द्वारा 9 जून को आधुनिक फलवृद्धि तकनीकों व प्राकृतिक खेती पर आधारित एक प्रभावशाली जन-जागरूकता शिविर का आयोजन किया गया।

यह कार्यक्रम हिमालयी दुर्गमता और प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण, भारत-तिब्बत सीमा के समीप स्थित छितकुल पंचायत में सम्पन्न हुआ, 

जो समुद्र तल से 11,500 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस कार्यक्रम में स्थानीय किसानों, बागवानों, युवाओं, ग्राम पंचायत सदस्यों, 

आईटीबीपी के अधिकारी और जवानों की उत्साहजनक भागीदारी रही। यह आयोजन भारत-तिब्बत स्थानीय सीमा क्षेत्र के डिप्टी कमांडेंट के सहयोग से आयोजित किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के निदेशक (विस्तार शिक्षा), डॉ. इन्द्र देव ने मुख्य वक्तव्य दिया। उन्होंने बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, 

गुजरात और तेलंगाना जैसे विभिन्न राज्यों के स्थानीय भारत-तिब्बत सीमा में तैनात अधिकारियों और जवानों के साथ-साथ किसानों को प्राकृतिक खेती

व आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित किया। उन्होंने स्थानीय संसाधनों के माध्यम से औद्यानिकी विविधीकरण और कृषि पर्यटन को बढ़ावा देने के महत्व पर बल दिया।

डॉ. प्रमोद शर्मा, सह-निदेशक (अनुसंधान एवं प्रसार) एवं प्रमुख, केवीके किन्नौर ने अपने संबोधन में प्राकृतिक समाधान आधारित फल उत्पादन की शुरुआत करने की आवश्यकता को रेखांकित

किया। साथ ही उन्होंने केवीके किन्नौर द्वारा अपनाई गई उच्च घनत्व तकनीक पर आधारित सीडलिंग रूटस्टॉक पर सेब

उत्पादन के सफल प्रायोगिक मॉडल की जानकारी दी, जो जिला के सुंगरा, तेलंगी और नाको इत्यादि क्षेत्रों में  प्रदर्शित हैं।

डॉ. अरुण नेगी, फल वैज्ञानिक ने स्थायी फल उत्पादन पद्धतियों पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि कैसे ये उपाय आय वृद्धि और पर्यावरण संरक्षण दोनों में सहायक हो सकते हैं।

बागवानी विभाग और पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने उपस्थित जनसमूह को विभिन्न सरकारी योजनाओं और तकनीकी हस्तक्षेपों के बारे में अवगत कराया, जो बागवानी के उन्नयन में सहायक हो सकते हैं।

ग्राम पंचायत के उप-प्रधान राजेश ने स्थानीय किसानों से केवीके विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने की अपील की, जिससे इस दुर्गम क्षेत्र में भी उत्पादकता और स्थायित्व

सुनिश्चित किया जा सके। वहीं आईटीबीपी के एएसआई देवकी नंदन ने स्थानीय कृषि समुदाय और सुरक्षा बलों के गहरे

आपसी संबंध को रेखांकित करते हुए और विशेष रूप से मस्तरंग कैंप जैसे क्षेत्रों में स्वावलंबी बागवानी उत्पादन को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।

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यह ऐतिहासिक शिविर आयोजन, हरित, आत्मनिर्भर और अधिक सशक्त हिमालयी कृषि व बागवानी व्यवस्था की दिशा में

एक और महत्वपूर्ण कदम है, जो भारत सरकार के विकसित कृषि संकल्प अभियान की दृष्टि के साथ पूरी तरह समन्वित है।

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