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हिमाचल के छात्र संगठनों ने उठाई मांगों की आवाज, शिक्षा एवं रोजगार को लेकर सरकार पर साधा निशाना

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हिमाचल समय, शिमला, 05 दिसंबर ।

हिमाचल प्रदेश के विभिन्न छात्र संगठनों ने मिलकर प्रदेश सरकार के समक्ष एक चार्टर जारी कर 11 प्रमुख मांगें रखी हैं। इनमें छात्र संघ चुनावों की बहाली से लेकर विश्वविद्यालयों के संसाधनों और रोजगार के मुद्दे शामिल हैं।

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छात्र नेताओं का कहना है कि ये मांगें प्रदेश की शिक्षा प्रणाली और युवाओं के भविष्य से जुड़े अहम सवाल हैं, जिन पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।छात्राओं ने ये भी कहा की कॉलेज में शौचालयों का बहुत बुरा हाल है ,आपातकाल में छात्रों को या तो छात्रावास् जाना पड़ता है या यहां फिर मजबूरी मे उसी गंदे शौचालय का उपयोग करना पड़ता है

प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  1. प्रदेश सरकार तुरंत छात्र संघ चुनाव बहाल करे, जिससे लोकतांत्रिक छात्र प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।
  2. मंडी स्थित सरदार पटेल विश्वविद्यालय (एसपीयू) के अधिकार क्षेत्र और शैक्षणिक दायरे का विस्तार किया जाए।
  3. पालमपुर स्थित कृषि विश्वविद्यालय की 112 हेक्टेयर भूमि को सरकार द्वारा हड़पने की कोशिश को तुरंत रोका जाए।
  4. कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर, तकनीकी विश्वविद्यालय हमीरपुर और डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी विश्वविद्यालय नौनी में स्थायी कुलपतियों की नियुक्ति शीघ्र की जाए।
  5. केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला परिसर के निर्माण कार्य के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में लंबित 30 करोड़ रुपये तुरंत जमा करवाए जाएं।
  6. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 को प्रदेश में पूर्ण रूप से लागू किया जाए।
  7. राजकीय महाविद्यालयों और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) के क्षेत्रीय केंद्रों की आधारभूत संरचना को मजबूत बनाया जाए।
  8. एचपीयू और एसपीयू सहित सभी विश्वविद्यालयों में परीक्षा मूल्यांकन प्रक्रिया को पारदर्शी और मजबूत बनाया जाए।
  9. प्रदेश के 100 स्कूलों को ‘परिवर्तित’ करने के सरकारी निर्णय को तुरंत वापस लिया जाए।
  10. सरकार द्वारा 5 लाख नौकरियां देने के “झूठे दावे” बंद करके युवाओं को स्थायी रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएं।
  11. प्रदेश में बिगड़ती कानून-व्यवस्था और बढ़ती नशाखोरी की समस्या पर तुरंत अंकुश लगाया जाए।
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छात्र नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इन जरूरी मुद्दों पर जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो वे प्रदेशव्यापी आंदोलन तेज करने को मजबूर होंगे। उनका आरोप है कि शिक्षा और युवाओं के मुद्दे सरकार की प्राथमिकता सूची में पीछे छूट गए हैं।

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