भावना ठाकुर,
13 सितंबर / सोलन।
शूलिनी यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ लॉ के छात्रों ने 12 सितंबर को सोलन ज़िला अदालत में आयोजित लोक अदालत के शैक्षिक दौरे के दौरान न्याय प्रणाली का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया। यह दौरा स्कूल ऑफ़ लॉ के लीगल एड क्लिनिक द्वारा आयोजित किया गया था, ताकि छात्रों को वैकल्पिक विवाद समाधान और आपसी सहमति से विवादों के निपटारे के बारे में व्यावहारिक जानकारी मिल सके।

इस दौरे का उद्देश्य कक्षा की पढ़ाई को कोर्टरूम की कार्यप्रणाली से जोड़ना था, ताकि छात्र यह देख सकें कि लोक अदालतें किस तरह विवादों का त्वरित, सौहार्दपूर्ण और किफायती समाधान करती हैं। कार्यवाही के दौरान, उन्होंने निपटारे की प्रक्रिया को देखा और समझौते के माध्यम से मामलों को सुलझाने में शामिल न्यायिक और प्रक्रियात्मक पहलुओं को समझा।
छात्रों ने संपत्ति और बंटवारे के विवादों, पारिवारिक और वैवाहिक मामलों, मोटर दुर्घटना मुआवज़े के दावों, पैसे की वसूली के मामलों, बैंक और ऋण संबंधी मामलों, समझौता-योग्य आपराधिक मामलों और अन्य दीवानी विवादों से जुड़ी कार्यवाहियों को देखा।
कार्यवाही अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश-I अभय मंडियाल; सिविल जज-सह-मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट दिव्या ज्योति पटियाल; अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश-II विवेक खनाल; न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी निकिता ताहिम; और ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश शरद कुमार के समक्ष देखी गई। इस अनुभव से छात्रों को निपटारे की सुविधा प्रदान करने, बयान दर्ज करने और पक्षों को आपसी सहमति से समाधान तक पहुँचने में मदद करने में न्यायाधीशों और वकीलों की भूमिकाओं के बारे में जानकारी मिली।
लीगल एड क्लिनिक के समन्वयक विनीत कुमार ने इस दौरे का समन्वय किया, और स्कूल ऑफ़ लॉ की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रितु पांटा और निधि सिंह छात्रों के साथ गईं।
इस पहल को मिले सहयोग के लिए आभार जताते हुए, लीगल एड क्लिनिक ने शूलिनी यूनिवर्सिटी के चांसलर प्रो. पी.के. खोसला, वाइस चांसलर प्रो. अतुल खोसला, स्कूल ऑफ़ लॉ के डीन प्रो. कमल जीत सिंह और प्रो. रेनू पाल सूद का धन्यवाद किया। इन सभी ने कानूनी जागरूकता, कम्युनिटी एंगेजमेंट और सामाजिक रूप से ज़रूरी कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने वाली गतिविधियों के लिए लगातार प्रोत्साहन दिया है।
स्कूल ऑफ़ लॉ के डीन प्रो. कमल जीत सिंह ने कहा कि इस दौरे से छात्रों को “क्लासरूम से कोर्टरूम” तक का एक सार्थक अनुभव मिला और उन्हें यह समझने में मदद मिली कि कानूनी प्रैक्टिस में सिर्फ़ कानूनों और प्रक्रियाओं की जानकारी ही काफ़ी नहीं है। उन्होंने कहा कि असल अदालती कार्यवाही को देखने से भविष्य के कानूनी पेशेवरों को बातचीत, सुलह, सहानुभूति और न्याय दिलाने की प्रक्रिया में ज़िम्मेदार भागीदारी के महत्व को समझने में मदद मिलती है।








