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शूलिनी यूनिवर्सिटी में ‘राबता’ ने गुरु दत्त के जीवन को मंच पर उतारा

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भावना ठाकुर,

22 अक्टूबर / सोलन।

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दिल्ली के थिएटर ग्रुप ‘राबता’ ने अपने नाटक ‘बेमिसाल गुरु दत्त: ज़िंदगी, सिनेमा और ख़्वाब’ के ज़रिए महान फिल्म निर्माता गुरु दत्त के जीवन, उनके सपनों और रचनात्मक संघर्षों को शूलिनी यूनिवर्सिटी के कैंपस में पेश किया। इस प्रस्तुति में लगभग 360 छात्रों, फैकल्टी सदस्यों और मेहमानों ने हिस्सा लिया। यह सातवें ‘शूलिनी लिटरेचर फेस्टिवल’ का पहला पूर्व-आयोजन था, जो 12 से 14 मार्च, 2027 तक आयोजित किया जाएगा।


यह प्रस्तुति गुरु दत्त की पुण्यतिथि और ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस’ (दोनों 10 अक्टूबर को आते हैं) के दो दिन बाद हुई। नाटक में रचनात्मकता और भावनात्मक उथल-पुथल के बीच के संबंध को दर्शाया गया। इसमें फिल्म निर्माता की उपलब्धियों के पीछे छिपे अकेलेपन और उनकी संवेदनशीलता (vulnerability) पर प्रकाश डाला गया। ‘प्यासा’ और ‘कागज़ के फूल’ जैसी उनकी फिल्में भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाती हैं।
105 मिनट के इस नाटक में जीवनी पर आधारित कहानी के साथ-साथ संगीत, नृत्य और प्रकाश-छाया (light and shadow) का बेहतरीन तालमेल देखने को मिला। गुरु दत्त की फिल्मों की दृश्य-भाषा (visual language) का उपयोग करते हुए, इस नाटक ने उनकी फिल्मों के जादू और उनके व्यक्तित्व के विरोधाभासों को फिर से जीवंत कर दिया। प्रस्तुति के दौरान कभी हास्य, कभी पुरानी यादें, तो कभी गहरी भावनाएं देखने को मिलीं; साथ ही, उस दौर की कविता और संगीत को भी बखूबी पेश किया गया।
शूलिनी लिटरेचर फेस्टिवल की डायरेक्टर और चीफ लर्निंग ऑफिसर, शूलिनी यूनिवर्सिटी प्रो. आशू खोसला ने कहा, “हम अक्सर रचनात्मकता की सुंदरता का जश्न मनाते हैं, लेकिन इसके साथ जुड़ी भावनात्मक कीमत के बारे में शायद ही कभी बात करते हैं। गुरु दत्त का जीवन हमें याद दिलाता है कि असाधारण प्रतिभा और गहरी संवेदनशीलता एक साथ हो सकती हैं। 10 अक्टूबर को ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस’ होने के कारण, यह प्रस्तुति विशेष रूप से प्रासंगिक थी। इसने हमारे छात्रों को न केवल बेहतरीन सिनेमा के बारे में, बल्कि एक कलाकार के पीछे छिपे इंसान के बारे में भी सोचने का मौका दिया।”
चांसलर प्रो. पी.के. खोसला ने भारतीय सिनेमा के एक महत्वपूर्ण अध्याय को कैंपस तक लाने के लिए कलाकारों की सराहना की। उन्होंने कहा, “विश्वविद्यालय ऐसी जगहें होनी चाहिए जहाँ विज्ञान, साहित्य, सिनेमा और प्रदर्शन कलाएँ एक साथ आ सकें। शिक्षा का अर्थ केवल ज्ञान प्राप्त करना ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, कल्पनाशीलता और सहानुभूति विकसित करना भी है।” प्रस्तुति के बाद, प्रो. खोसला और श्रीमती सरोज खोसला ने वहाँ आए कलाकारों को सम्मानित किया।
‘राबता’ कहानी सुनाने, कविता और लाइव संगीत के माध्यम से साहित्य को मंच पर लाता है। इसके प्रस्तुतियों में ‘वो अफ़साना’ शामिल है, जो साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम के रिश्ते को दर्शाती है; और ‘चंद किस्से’, जिसमें उर्दू साहित्य की कहानियाँ पेश की जाती हैं।
विश्वविद्यालय के छात्र थिएटर समूह के सदस्यों ने इस कार्यक्रम के आयोजन और व्यवस्थाओं के समन्वय में मदद की। ऐसा करने से उन्हें थिएटर प्रोडक्शन और इवेंट मैनेजमेंट का व्यावहारिक अनुभव मिला।

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