सोफत की कलम से.........

सोफत की कलम से.........

#सोलन

कोरोना महामारी की इस आपदा मे कुछ सक्ष्म अधिकारियों ने अपनी योग्यता को साबित किया है। महाराष्ट्र सरकार मे कार्यरत दो भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसरों की मीडिया मे खूब प्रशंसा हो रही है। उनकी प्रंशसा करने वालो मे देश के ख्याति प्राप्त पूर्व आई पी एस अधिकारी जूलियो रिबेरो भी शामिल है। पिछले कल उनके द्वारा लिखित लेख मे जो कि प्रतिष्ठित अग्रेंजी और हिंदी दैनिक मे छपे इन दोनों अफसरों इकबाल सिंह चहल और डॉo राजेन्द्र भारूद की खूब तारीफ की है। इसके साथ ही रिबेरो ने मुख्यमंत्री उद्वव ठाकरे को भी चहल को बतौर मुम्बई के निगम आयुक्त को काम करने और निर्णय लेने की छूट देने के लिए भी साधुवाद दिया है। इकबाल सिंह चहल जो कि पजांब के मूल निवासी है और लेफ्टिनेंट कर्नल के बेटे और पजांब के पूर्व मुख्य सचिव अजीत सिंह चट्टा के दामाद है। दुसरे है डॉo राजेन्द्र भारूद जो की चहल की विपरीत पृष्ठभूमि से सम्बंध रखते है। वह भील समुदाय के एक जन-जातीय एकल माता के बेटे है। जिस माँ ने अपने तीन बेटे को पढ़ाने के लिए जमींदारों के खेत मे मेहनत की थी। इकबाल चहल ने 8 मई 2020 को अपना पदभार संभाला और उसी शाम अपने 24 वार्ड अधिकारियों से लम्बी बैठक की। इन अधिकारियों से जानकारी प्राप्त करने के बाद वह अपने काम मे जुट गए और फिर पिछे मुड़कर नहीं देखा। कोरोना से निपटने के लिए उन्होंने 24 वार -रूम स्थापित किए। इन वार रूम के माध्यम से उन्हे प्रत्येक वार्ड के मरीजों और बिस्तरों की उपलब्धता की पल-पल की जानकारी मिलती थी। डॉक्टर जो तीन शिफ्टों मे काम कर रहे थे। उन्होंने तुरंत प्रभाव से नये बने डॉक्टरों को पचास हजार रूपए प्रति मास पर नियुक्त कर डॉक्टरों और अन्य स्टाफ मे वृद्धि की। उन्होंने 800 इनोवा गाडियाँ हायर की और उन्हें अस्थाई एंबुलेंसों मे परिवर्तित किया। बात लम्बी न हो इसलिए संक्षेप मे इतना बताना काफी है कि चहल ने पुरे कोविड रिस्पांस मैकेनिज्म को पुनर्गठित किया और इसे दिन-रात काम करने वाला बनाने मे सफलता हासिल की। चहल अब तीसरी लहर की भी तैयारी कर रहे है। सात विशाल अस्पताल स्थापित किए गये है। उनकी योजना मे डॉक्टर, कर्मचारी, उपकरण और दवाओं का प्रबंधन भी शामिल है।

जिस तरह निष्ठा तथा कार्य का प्रदर्शन चहल ने किया वैसी उपलब्धियां डॉo राजेन्द्र भारूद की भी है। मूल रूप से मेडिकल गैजुएट इस 33 वर्षीय आई ए एस अधिकारी को जिला नन्दुरवार की 16 लाख जनसंख्या को उपलब्ध पुरानी और नकारा चिकित्सा सुविधाओं से निपटना था। इस जनसंख्या के पास कोई भी आधुनिक संचार माध्यम नहीं था। यहां तक लोग आज के समय मे मोबाइल सुविधा से भी वंचित थे। वह वैक्सीन लगाने के लिए तैयार नहीं थे, परन्तु एक बात भारूद के पक्ष मे थी यह भी जनजातीय क्षेत्र था और यहाँ भी भील बड़ी संख्या मे थे। भारूद की पृष्ठभूमि इनके काम आई और इन्हे उनके साथ संवाद बनाने मे कठनाई नहीं आई। डॉo भारूद पांच ऑक्सीजन सयंत्र दस दिनों के अन्दर स्थापित कर अपनी योग्यता और कार्य के प्रति प्रतिबद्धता का बखूबी प्रदर्शन किया है। 85 लाख रूपये हर एक सयंत्र पर खर्च हुए है। इसके लिए जिला विकास परिषद के पास फंड उपलब्ध थे। आपातकाल और आपदा मे जो तुरंत निर्णय लेने की क्षमता मौके के अधिकारी के पास होनी चाहिए वह क्षमता इन दोनों अधिकारियों के पास दिखाई दी। इसीलिए यह दोनों अधिकारी कोरोना की इस जंग मे विजेता बन कर उभरे है। आपदा के घोर अंधेरे मे इन दो जुगनुओं ने अपनी रोशनी से अंधेरे मे कुछ तो आशा की किरण दिखलाई है। मुम्बई जैसे महानगर मे यदि प्रबन्धन कठिन है तो पिछड़े जनजातीय और ग्रामीण क्षेत्रों मे भी सरल नहीं है, परन्तु जो सफल प्रबन्धन इन दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र मे किया है वह इनकी योग्यता और कर्तव्यनिष्ठा का परिणाम है। यह पोस्ट लिखने का उद्देश्य है कि अन्य अधिकारी भी इनसे प्रेरणा प्राप्त करें।