सोफत की कलम से......................

हिमाचल मे स्थापित सीमेंट उद्योग ने *फिर से सीमेंट के दामों मे इजाफा* कर दिया है। बताया जा रहा है *प्रति बैग लगभग 15 रूपये इजाफा* किया गया है। सबसे खेद की बात है कि हमारे यहां चार बड़े सीमेंट के उद्योग है, *परन्तु आश्चर्य* इस बात का है कि *हिमाचल प्रदेश मे जहां सीमेंट का उत्पादन* होता है, *वहां पर सीमेंट महंगा* बेचा जा रहा है। हमारे प्रदेश मे बनने वाला *सीमेंट बाहर सस्ता* बिक रहा है। अब इस कीमत को कम करवाने का हल ढूंढने की जगह इस पर राजनीति शुरू हो गई है। हालांकि यह बात सही है कि पहाड़ हमारे है, इस *उद्योग से होने वाले प्रदूषण से भी हमे ही जूझना पड़ता है*। इसके बावजूद *महंगा सीमेंट भी हमे ही खरीदना पड़ता है*। आज के समाचार पत्रों मे *कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष श्री कुलदीप राठौर जी का एक ब्यान* छपा है। उन्होंने अपने ब्यान मे कहा है कि *"लगता है सरकार ने कंपनियों के आगे अपने घुटने टेक दिए है "*। कुलदीप जी पढ़े लिखे वकील है *उन्होंने जरूर सुना होगा* कि *"जिनके घर शीशे के होते हैं, उन्हे दुसरों के घरों पर पत्थर नहीं मारने चाहिए "*। यह सीमेंट आज ही प्रदेश मे महंगा नहीं बिक रहा है। जब कांग्रेस सत्ता मे थी और *वर्तमान विधायक दल के नेता आदरणीय मुकेश अग्निहोत्री* प्रदेश के उद्योग मंत्री थे तब भी स्थिति ऐसी ही थी। मैंने अपने स्तर पर इस विषय मे जानकारियां जुटाने का प्रयास किया। मुझे सरकारी अधिकारियों से जो जानकारी मिली उनके अनुसार *ऐसा कोई प्रावधान कानून मे नहीं* है कि प्रदेश *सरकार सीमेंट के रेट तय कर सके* या नियंत्रित कर सकें। इस का अर्थ यह कदापि नहीं की सरकार कुछ नहीं कर सकती। हमारे *गुरु जी का कहना,* कि *नीचे सरकार और ऊपर भगवान*। वह यदि चाहे तो कुछ भी कर सकते है। यदि आज कोई कानूनी प्रावधान नहीं है तो *विधानसभा मे विधेयक ला कर कानून बनाया जा सकता है*। यह हिमाचल की जनता के साथ कि उन्हें महंगा सीमेंट खरीदना पड़ रहा है *नाइसांफी तो है ही* साथ मे यह बहुत अटपटा भी है कि बाहर जाने वाले सीमेंट पर भाड़ा भी लगता है । फिर भी वहां सस्ता सीमेंट बिक रहा है। सरकार सीमेंट कम्पनियों से बात करें और जरूरी हो तो *कानूनविदों और कानून विभाग से सलाह मशविरा कर कानून बनाने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करें*। *आज इतना ही* कल फिर नई कड़ी के साथ मिलेंगे।

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